पुरातत्व · नालंदा
नालंदा विश्वविद्यालय का पूरा इतिहास: 1915 की खुदाई में क्या मिला और इसे किसने नष्ट किया?
बिहार के बड़गाँव के टीलों के नीचे सदियों तक दबा रहा एक पूरा महाविहार। 1915 की खुदाई ने क्या दिखाया, ह्वेनसांग ने क्या लिखा, और 'किसने जलाया' — इस सवाल पर प्रमाण असल में क्या कहते हैं।
मुख्य बातें
- 01नालंदा कोई आधुनिक अर्थ वाला 'विश्वविद्यालय' नहीं, बल्कि एक विशाल बौद्ध महाविहार था जहाँ आवास, पूजा और अध्ययन एक साथ चलते थे।
- 02इसकी शुरुआत आमतौर पर 5वीं सदी के गुप्त काल से मानी जाती है; बाद में हर्षवर्धन और पाल शासकों ने इसे संरक्षण दिया।
- 03भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की व्यवस्थित खुदाई 1915 में शुरू हुई और मठों, मंदिरों, स्तूप तथा 'नालंदा महाविहार' नाम वाली मुहरें सामने आईं।
- 04पतन के लिए अक्सर बख़्तियार ख़िलजी का नाम लिया जाता है, लेकिन समकालीन स्रोत इस पर उतने स्पष्ट नहीं हैं जितना लोकप्रिय कथा बताती है।
- 052016 में UNESCO ने नालंदा महाविहार के पुरातात्विक स्थल को विश्व धरोहर घोषित किया।
संपादकीय समीक्षा लंबित: इस लेख के तथ्य नीचे दिए स्रोतों पर आधारित हैं, लेकिन अंतिम संपादकीय जाँच अभी बाकी है। कोई गलती दिखे तो हमें बताएँ।
बिहार में राजगीर के पास बड़गाँव गाँव के आसपास सदियों तक मिट्टी के ऊँचे टीले दिखाई देते रहे। स्थानीय लोग जानते थे कि नीचे कुछ पुराना है, लेकिन कितना बड़ा — यह किसी को पता नहीं था। बीसवीं सदी की शुरुआत में जब इन टीलों की व्यवस्थित खुदाई शुरू हुई, तो ज़मीन के नीचे से एक पूरा महाविहार निकलने लगा।
यह लेख हमारी नालंदा documentary का लिखित रूप है। इसमें हम अलग-अलग बताएँगे कि कौन-सी बातें पुरातात्विक और लिखित स्रोतों से दर्ज हैं, और कौन-सी लोकप्रिय कथा का हिस्सा हैं।
नालंदा असल में क्या था?
आज हम नालंदा को 'विश्वविद्यालय' कहते हैं, लेकिन मूल रूप से यह एक महाविहार था — यानी भिक्षुओं का बड़ा आवासीय और शैक्षिक परिसर। यहाँ के मठों (विहारों) में भिक्षु रहते थे, मंदिरों और स्तूपों में पूजा होती थी, और इन्हीं के बीच व्याकरण, तर्कशास्त्र, बौद्ध दर्शन, चिकित्सा जैसे विषयों पर अध्ययन और शास्त्रार्थ चलता था।
स्थापना कब और किसने की?
नालंदा की स्थापना की कोई एक तारीख़ दर्ज नहीं है। इतिहासकार आमतौर पर इसकी शुरुआत पाँचवीं सदी ईस्वी के गुप्त काल से जोड़ते हैं। सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 'शक्रादित्य' नाम के राजा का उल्लेख किया है, जिसे कई विद्वान गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम मानते हैं। यह पहचान व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है, लेकिन इसे अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता।
5वीं सदी ई.
गुप्त काल में नालंदा महाविहार की शुरुआत — तिथि अनुमानित है, अभिलेखीय और यात्रा-वृत्तांतों पर आधारित।
स्वर्ण काल: ह्वेनसांग और पाल शासक
सातवीं सदी में चीनी भिक्षु ह्वेनसांग (Xuanzang) भारत आए और नालंदा में कई वर्षों तक आचार्य शीलभद्र के अधीन अध्ययन किया। उनके यात्रा-वृत्तांत और उनके शिष्य द्वारा लिखी जीवनी में नालंदा के भवनों, अनुशासन और विद्वानों का विस्तृत विवरण मिलता है। उसी सदी के उत्तरार्ध में एक और चीनी भिक्षु, इत्सिंग (Yijing), ने भी यहाँ अध्ययन किया।
आठवीं से बारहवीं सदी तक पूर्वी भारत के पाल शासकों ने नालंदा को संरक्षण दिया। इसी दौर में विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे दूसरे महाविहार भी उभरे।
नालंदा में छात्रों और भिक्षुओं की संख्या हज़ारों में बताई जाती है — लेकिन ये आँकड़े यात्रा-वृत्तांतों से आते हैं, किसी गिनती या रजिस्टर से नहीं।
नौ मंज़िला पुस्तकालय की कहानी
नालंदा के पुस्तकालय 'धर्मगंज' और उसके तीन भवनों — रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक — का उल्लेख अक्सर किया जाता है। ये नाम मुख्य रूप से बाद के तिब्बती स्रोतों से आते हैं। खुदाई में अब तक ऐसा कोई ढाँचा निश्चित रूप से नहीं पहचाना गया है जिसे यही पुस्तकालय कहा जा सके।
पतन: नालंदा को किसने नष्ट किया?
यह नालंदा से जुड़ा सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। लोकप्रिय कथा के अनुसार बारहवीं सदी के अंत में बख़्तियार ख़िलजी के आक्रमण ने नालंदा को जला दिया।
समकालीन फ़ारसी इतिहास 'तबक़ात-ए-नासिरी' बिहार में एक किलेनुमा विहार पर हमले और वहाँ के भिक्षुओं की हत्या का वर्णन करता है, लेकिन उसमें नालंदा का नाम नहीं है। कई इतिहासकार उस विवरण को ओदंतपुरी महाविहार से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, तिब्बती भिक्षु धर्मस्वामी ने 1230 के दशक में नालंदा देखा और लिखा कि वह क्षतिग्रस्त और लगभग वीरान था, फिर भी एक वृद्ध आचार्य वहाँ कुछ शिष्यों को पढ़ा रहे थे।
1915 की खुदाई: ज़मीन से क्या निकला?
उन्नीसवीं सदी में फ़्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन ने इस क्षेत्र का सर्वे किया, और बाद में अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने बड़गाँव के खंडहरों को प्राचीन नालंदा के रूप में पहचाना। लेकिन बड़े पैमाने पर व्यवस्थित खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 1915 में शुरू की, जो कई चरणों में 1930 के दशक तक चली।
1915
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने नालंदा में व्यवस्थित खुदाई शुरू की।
खुदाई में सामने आई प्रमुख संरचनाएँ और वस्तुएँ
- विहार (मठ)
- पंक्तिबद्ध आवासीय-शैक्षिक भवन, जिनमें आँगन, कक्ष और चबूतरे थे। प्रचलित गिनती लगभग 11 मठों की है।
- मंदिर और चैत्य
- ईंटों के बड़े मंदिर-ढाँचे; इनमें 'साइट 3' का विशाल स्तूप-मंदिर सबसे प्रसिद्ध है, जिसे परंपरा सारिपुत्र से जोड़ती है।
- मुहरें और अभिलेख
- मिट्टी की मुहरें और ताम्रपत्र/शिलालेख, जिनसे स्थल की पहचान और संरक्षकों की जानकारी मिली।
- काँसे और पत्थर की मूर्तियाँ
- बुद्ध और बोधिसत्वों की प्रतिमाएँ, जिनमें से कई अब नालंदा पुरातत्व संग्रहालय में हैं।
नालंदा: क्या दर्ज है और क्या परंपरा है
5वीं सदी में शुरुआत
- स्थिति:
- व्यापक रूप से स्वीकार
- मुख्य आधार:
- अभिलेख, ह्वेनसांग का विवरण
ह्वेनसांग ने यहाँ पढ़ाई की
- स्थिति:
- दर्ज
- मुख्य आधार:
- उनका यात्रा-वृत्तांत और जीवनी
हज़ारों छात्र-भिक्षु
- स्थिति:
- यात्रा-वृत्तांत पर आधारित
- मुख्य आधार:
- चीनी स्रोत
नौ मंज़िला पुस्तकालय
- स्थिति:
- परंपरा
- मुख्य आधार:
- बाद के तिब्बती स्रोत
तीन महीने तक आग
- स्थिति:
- अप्रमाणित
- मुख्य आधार:
- कोई प्राथमिक स्रोत नहीं मिला
आज का नालंदा: विश्व धरोहर और नया विश्वविद्यालय
2016 में UNESCO ने 'Archaeological Site of Nalanda Mahavihara' को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। इसके अलावा, 2010 के एक क़ानून के तहत राजगीर में नए नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जिसका आधुनिक परिसर 2024 में शुरू हुआ। यह नया संस्थान प्राचीन महाविहार की स्मृति से प्रेरित है, लेकिन उसका सीधा उत्तराधिकारी नहीं है।
नालंदा की समय-रेखा
5वीं सदी
गुप्त काल में शुरुआतअनुमानित
7वीं सदी
ह्वेनसांग और इत्सिंग का अध्ययनदर्ज
8–12वीं सदी
पाल शासकों का संरक्षणदर्ज
लगभग 1200
आक्रमण, संरक्षण का अंत और पतनअनुमानित
1230 का दशक
धर्मस्वामी ने क्षतिग्रस्त नालंदा देखादर्ज
1915
ASI की व्यवस्थित खुदाई शुरूदर्ज
2016
UNESCO विश्व धरोहरदर्ज
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की थी?
कोई एक निश्चित संस्थापक दर्ज नहीं है। शुरुआत आमतौर पर 5वीं सदी के गुप्त काल से जोड़ी जाती है, और ह्वेनसांग द्वारा उल्लिखित राजा 'शक्रादित्य' को कई विद्वान कुमारगुप्त प्रथम मानते हैं।
नालंदा को किसने जलाया?
लोकप्रिय कथा बख़्तियार ख़िलजी का नाम लेती है। तेरहवीं सदी के आक्रमणों से भारी नुक़सान हुआ, लेकिन समकालीन स्रोत संकेत देते हैं कि पतन एक लंबी प्रक्रिया थी और कुछ विवरणों पर इतिहासकारों में मतभेद है।
नालंदा की खुदाई कब हुई?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1915 में व्यवस्थित खुदाई शुरू की, जो कई चरणों में 1930 के दशक तक चली। बाद में भी कुछ हिस्सों पर काम हुआ।
क्या नालंदा UNESCO विश्व धरोहर है?
हाँ, 2016 से 'Archaeological Site of Nalanda Mahavihara' UNESCO विश्व धरोहर स्थल है।
स्रोत और संदर्भ
इस लेख में उपयोग किए गए प्राथमिक और द्वितीयक स्रोत। हम कोई काल्पनिक संदर्भ नहीं देते।
- [1]
- [2]
Nalanda (site guidebook)
A. Ghosh, Archaeological Survey of India
पुरातात्विक रिपोर्ट · ASI की आधिकारिक स्थल-पुस्तिका; कई संस्करण उपलब्ध।
- [3]
The University of Nalanda
H. D. Sankalia, 1934
पुस्तक
- [4]
Si-Yu-Ki: Buddhist Records of the Western World
ह्वेनसांग का वृत्तांत, अनुवाद: Samuel Beal (1884)
प्राथमिक स्रोत
- [5]
The Life of Hiuen-Tsiang (by Hwui Li)
अनुवाद: Samuel Beal
प्राथमिक स्रोत
- [6]
Biography of Dharmasvamin
अनुवाद: George Roerich, K. P. Jayaswal Research Institute, Patna (1959)
प्राथमिक स्रोत
- [7]
Nalanda University (Rajgir) — official website
विश्वविद्यालय
इस कहानी से जुड़े
लेखक
Story Factory Hindi Research Team
Story Factory Hindi Research Team हमारे YouTube चैनल की हर documentary के पीछे का शोध करती है और उसी शोध को इस वेबसाइट पर विस्तृत लेखों में बदलती है।



